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भारत में बिना धुएँ वाला तंबाकू

भारत में तंबाकू की सबसे बड़ी समस्या धुएँ वाली नहीं है

भारत में लगभग 20 करोड़ लोग खैनी, गुटखा, ज़र्दा या तंबाकू वाला पान खाते हैं। यह सिगरेट-बीड़ी पीने वालों से दोगुना है, और देश के हर चार तंबाकू इस्तेमाल करने वालों में से तीन यही हैं। फिर भी सरकार की तंबाकू नीति में इस पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है, और पाबंदियों का असर भी यहीं सबसे कम हुआ है।

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20 करोड़लोग बिना धुएँ वाला तंबाकू खाते हैं, जबकि धूम्रपान करने वाले लगभग 10 करोड़ हैं (GATS-2, 2016–17)
11.2%वयस्क खैनी खाते हैं। यह सबसे आम है। गुटखा 6.8% खाते हैं (GATS-2)
5 गुनाबढ़ा गाँवों में गुटखा खाने वाले घरों का हिस्सा, 2011–12 से 2023–24 के बीच (EAC-PM)
3.5 लाख से ज़्यादामौतें हर साल बिना धुएँ वाले तंबाकू से, इनमें हर पाँच में से तीन महिलाएँ (सिन्हा और अन्य, 2014)

कौन खाता है

सबसे ज़्यादा खाई जाती है खैनी, यानी चूने के साथ मली हुई तंबाकू: 11.2% वयस्क इसे खाते हैं। इसके बाद गुटखा और मावा (6.8%) और तंबाकू वाला पान (5.8%) आते हैं (GATS-2)। शहरों से ज़्यादा गाँवों में इसका चलन है (15.2% के मुकाबले 24.6% वयस्क), और आधे लोग इसे खुला खरीदते हैं।

इसका सबसे बड़ा बोझ गरीब परिवारों पर पड़ता है। गाँवों के सबसे गरीब 40% परिवारों में से 70.2% तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं। ये परिवार अपने महीने के खर्च का 4% पान, तंबाकू और नशे पर खर्च करते हैं, जबकि पढ़ाई पर सिर्फ़ 2.5% (EAC-PM वर्किंग पेपर, 2026)।

लोग इसका खतरा पहले से जानते हैं। 96% वयस्क मानते हैं कि बिना धुएँ वाला तंबाकू गंभीर बीमारी करता है, और इसे खाने वाले आधे लोग इसे छोड़ना चाहते हैं (GATS-2)। सिर्फ़ चेतावनियों से बात नहीं बनी है।

कागज़ पर पाबंदी, हर दुकान पर बिक्री

2011 से खाद्य सुरक्षा के नियम (रेगुलेशन 2.3.4) के तहत किसी भी खाने की चीज़ में तंबाकू या निकोटीन मिलाना मना है। इसी नियम से राज्यों ने गुटखे पर पाबंदी लगाई। जवाब में कंपनियों ने गुटखे को दो हिस्सों में बाँट दिया: पान मसाला और खुशबूदार तंबाकू अलग-अलग पाउच में, एक ही दुकान पर, ताकि खरीदने वाला खुद मिला ले। 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने इस तरीके को दर्ज किया और राज्यों को पाबंदी लागू करने को कहा (सेंट्रल अरेकानट मार्केटिंग कंपनी बनाम भारत सरकार)।

पाबंदी काम नहीं आई। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्यों के 2026 के एक वर्किंग पेपर के अनुसार, गाँवों में गुटखा खाने वाले घरों का हिस्सा 2011–12 में 5.3% था, जो 2023–24 में बढ़कर 30.5% हो गया। यानी पाँच गुना से ज़्यादा, कुल 5.96 करोड़ घर। शहरों में यह 3.1% से बढ़कर 16.8% हो गया। आज गाँवों में तंबाकू पर होने वाले कुल खर्च का 41% गुटखे पर होता है (EAC-PM, ThePrint की रिपोर्ट)।

पाबंदी से गुटखा गायब नहीं हुआ। इससे वह टुकड़ों में बिकने लगा, घुमा-फिराकर विज्ञापन होने लगे, और एक गैरकानूनी बाज़ार बन गया, जहाँ न गुणवत्ता की जाँच है, न बच्चों की सुरक्षा।
— डेरेक याच, अक्टूबर 2026 (हिन्दी अनुवाद)

कम नुकसान का रास्ता

बीमारी और मौत की वजह तंबाकू है, निकोटीन नहीं। बिना धुएँ वाला तंबाकू कैंसर पैदा करने वाली सबसे ऊँची श्रेणी (ग्रुप 1) में है, जबकि WHO की कैंसर एजेंसी IARC ने निकोटीन को कभी कैंसर पैदा करने वाला नहीं माना (AVI का विश्लेषण)। भारत में मुँह के लगभग 90% कैंसर बिना धुएँ वाले तंबाकू से होते हैं (टोबैको फ्री किड्स), और दुनिया में मुँह के कैंसर के 36% नए मरीज़ और 42% मौतें भारत में होती हैं (याच, 2026)।

निकोटीन पाउच में निकोटीन होता है, पर तंबाकू की पत्ती, सुपारी या चूना नहीं होता। अमेरिका की दवा और खाद्य एजेंसी (FDA) ने पाया कि जिन पाउच को उसने मंज़ूरी दी, उनमें सिगरेट और ज़्यादातर बिना धुएँ वाले तंबाकू के मुकाबले हानिकारक तत्व बहुत कम हैं (FDA, 2025)। जून 2026 में FDA ने यह कहने की इजाज़त भी दी कि सिगरेट की जगह इन्हें इस्तेमाल करने से मुँह के कैंसर का खतरा कम होता है (FDA, 2026)।

बड़े पैमाने पर लोग बदल सकते हैं। स्वीडन में लोगों ने सिगरेट छोड़कर स्नस अपनाया, और आज वहाँ यूरोप में सबसे कम लोग रोज़ सिगरेट पीते हैं। तंबाकू से होने वाली मौतें वहाँ यूरोपीय संघ के औसत से 44% कम हैं (GSTHR)। पड़ोसी पाकिस्तान में, जहाँ नसवार और गुटखा खूब खाया जाता है, पाउच तेज़ी से फैले हैं, खासकर उन वयस्कों में जो सिगरेट और पारंपरिक तंबाकू छोड़ रहे हैं (AVI का विश्लेषण)। स्वीडन का स्नस गुणवत्ता के तय मानकों पर बनता है, भारत की खैनी और गुटखा नहीं।

भारत में यह रास्ता बंद है। निकोटीन पाउच और स्नस को कानूनी तौर पर बेचने का कोई रास्ता नहीं है (कानूनी स्थिति, अंग्रेज़ी में), और सितंबर 2026 से स्वास्थ्य मंत्रालय पाउच को बिना मंज़ूरी वाली दवा मानता है (AVI का विश्लेषण)। नतीजा: खैनी और गुटखा हर पान की दुकान पर बिकते हैं, पर बहुत कम नुकसान वाले विकल्पों की जाँच तक नहीं होती।

AVI क्या चाहता है

  • नुकसान के हिसाब से नियम। हर तरह के तंबाकू को उसके नुकसान के हिसाब से देखा जाए, और जो बिकता है उसके लिए गुणवत्ता के सख्त मानक हों। ऐसी पाबंदियाँ नहीं जो उसे दो पाउच वाली तरकीब और गैरकानूनी बाज़ार की ओर धकेलें।
  • कम नुकसान वाले विकल्पों के लिए कानूनी रास्ता। निकोटीन पाउच और स्नस की प्रमाण के आधार पर, नियम-कायदे से जाँच हो, उम्र की जाँच के साथ। पूरी तरह रोक नहीं।
  • तंबाकू खाने वालों को नीति के केंद्र में रखें। भारत में हर चार तंबाकू इस्तेमाल करने वालों में से तीन धूम्रपान नहीं करते। सिर्फ़ सिगरेट को ध्यान में रखकर बनी नीति उन्हें पीछे छोड़ देती है।

यह पेज सामान्य जानकारी के लिए प्रकाशित प्रमाणों का सार है। यह डॉक्टरी सलाह नहीं है। तंबाकू छोड़ने का आपके लिए सही तरीका जानने के लिए डॉक्टर से बात करें।